प्रिय विद्यार्थियों, इस पोस्ट में श्वेताश्वतरोपनिषद् बहुविकल्पीय Shwetaswataropnishad MCQs है। जो संस्कृत की विविध प्रतियोगी परिक्षाओं NET JRF, TGT PGT तथा विश्वविद्यालय स्तरीय परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।
Q1. श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार जगत् का कारण है?
Q2. कौन काल से लेकर आत्मापर्यन्त समस्त कारणों का अधिष्ठान है?
Q3. श्वेताश्वतरोपनिषद् के प्रथम अध्याय में कितने मंत्र हैं?
Q4. तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं …….. में त्रिवृतं का तात्पर्य है –
शांकरभाष्य :- त्रिवृतं त्रिभिः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रकृतिगुणैर्वृतम्।
Q5. ‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’ इति कुत्र अस्ति?
ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १ ॥
जगत् में जो कुछ स्थावर-जंगम संसार है वह सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है [अर्थात् उसे भगवत्स्वरूप अनुभत्र करना चाहिये ] । उसके त्याग-भाव से तू अपना पालन कर; किसी के धन की इच्छा न कर ॥ १॥
Q6. यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति सर्वभूतेषु च आत्मानं ततो न विजुगुप्सते इति मंत्र उपलभ्यते ?
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६॥
जो [ साधक ] सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में ही देखता है और समस्त भूतों में भी आत्मा को ही देखता है वह इस [ सार्वात्म्यदर्शन ] के कारण ही किसी से घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥
Q7. श्वेताश्वतरोपनिषद् के प्रथम अध्याय में उद्धृत ‘शतार्धारं’ का अर्थ है।
Q8. नदी स्वरूप का वर्णन है –
शांकरभाष्य :- तत्र प्रथमेन मन्त्रेण (तमेकनेमिम इति) सर्वात्मानं ब्रह्म चक्रं दर्शयति, द्वितीयेन (पञ्चस्त्रीतोऽम्बुं इति) नदीरूपेण।
एवं तावन्नदीरूपेण ब्रह्म चक्ररूपेण च कार्यकारणात्मकं ब्रह्म सप्रपञ्चमिहाभिहितम्।
Q9. श्वेताश्वतरोपनिषद् में हंस से तात्पर्य है –
नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः ।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ 3.18॥
शांकरभाष्य :- हंसः परमात्मा।
Q10. “उद्गीतमेतत्परमं ब्रह्म तस्मिंत्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च।अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥1.7॥” में ‘त्रयं’ पद से तात्पर्य है –
शांकरभाष्य :- त्रयं प्रतिष्ठितं भोक्ता भोग्यं प्रेरितारमिति वक्ष्यमाणं भोग्यभोक्तृनियन्तृलक्षणम्।
Q11. श्वेताश्वतरोपनिषद् में अध्याय हैं –
Q12. श्वेताश्वतरोपनिषद् क्षर कहा जाता है –
क्षरं प्रधानम् अमृताक्षरं हरः ………. ॥१.१०॥
Q13. किसे अरणी के समान कहा जा रहा है?
स्वदेहम् अरिणं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्।
ध्याननिर्मथनाभ्याछेतं पश्येन्निगूढवत्॥१४॥
Q14. श्वेताश्वतरोपनिषद् का प्रथम अध्याय प्रसिद्ध है –
Q15. “आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि” वाक्यमिदं वर्त्तते – [MPPSC SSANSKRIT SET 2024]
Q16. शांकरभाष्य तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं से तात्पर्य नहीं है –
शांकरभाष्य :- त्रिवृतं त्रिभिः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रकृतिगुणैर्वृतम्।
षोडशको विकारः पञ्च भूतान्येकादशेन्द्रियाण्यन्तोऽवसानं विस्तारसमाप्तिर्यस्यात्मनस्तं षोडशान्तम् । अथवा प्रश्नोपनिषदि “यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्ति” (६।२) इत्यारभ्य
“स प्राणमसृजत प्राणाच्छूद्धाम्” (६।४) इत्यादिना प्रोक्ता नामान्ताः षोडशकला अवसानं यस्येति । अथवैकनेमिमिति कारणभूताव्याकृतावस्थाभिहिता ।
तत्कार्यसमष्टि भूतविराट्सूत्रद्वयं तद् व्यष्टिभूतभूरादिचतुर्दशभुवनान्यन्तोऽवसानं यस्य प्रपञ्चात्मनावस्थितस्य तं षोडशान्तम् ।
प्रश्नोपनिषद्के षष्ठ प्रश्नमें निम्नलिखित सोलह कलाएँ बतायी हैं- प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक और नाम। वहाँ ‘कला’ शब्दका अर्थ इस प्रकार है- ‘कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया, सा कला।’ अर्थात् जिसके द्वारा क (ब्रह्म) लीन (ढका हुआ) है उसे कला कहते हैं। इन्होंने ब्रह्मके पारमार्थिक स्वरूपको ढक रखा है, इसलिये ये कलाएँ हैं।
Q17. छान्दोग्योपनिषत् केन वेदेन सम्बद्धा ?
Q18. ‘उपनिषादयति सर्वानर्थकरं संसारं विनाशयति’ उपनिषदः व्युत्पतिरियं केन प्रदत्ता ? – [RPSC AP YAJURVEDA 2024]
उपनिषादयति सर्वानर्थकरं संसारं विनाशयति।
संसारकारणभूतामविद्यां च शिथिलयति, ब्रह्म च गमयति।।
(ईशावास्योपनिषद् भाष्य)
अर्थात् सभी अनर्थों को उत्पन्न करने वाले संसार का यह विनाश करती है, संसार के हेतु स्वरूप अविद्या को शिथिल करती है और ब्रह्म की प्राप्ति करवाती है।
Q19. ‘उपनिषद्’ इत्यत्र प्रत्ययः विद्यते – [RPSC AP YAJURVEDA 2024]
Q20. ………… स्वगुणैर्निगूढाम् ।
आशा है कि आपको श्वेताश्वतरोपनिषद् बहुविकल्पीय Shwetaswataropnishad MCQs उपयोगी और जानकारीपूर्ण लगा होगा। ऐसी ही उपयोगी जानकारी और मार्गदर्शन के लिए जुड़े रहें gopath.in & boks.in के साथ आपका सहयोग और विश्वास ही हमारी प्रेरणा है।
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