प्रिय विद्यार्थियों, इस पोस्ट में अर्थसंग्रह बहुविकल्पीय प्रश्न Arthsangrah MCQs है। जो संस्कृत की विविध प्रतियोगी परिक्षाओं NET JRF, TGT PGT तथा विश्वविद्यालय स्तरीय परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।
Q1. मीमांसादर्शने भावना कतिधा ? [MPPSC SET 2024]
भावना नाम भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः । सा च
द्विधा – शाब्दी भावना आर्थीभावना चेति ।
Q2. अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागः उच्यते – [MPPSC SET 2024]
तत्र अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधिः । स च तादृशप्रयोजनवदर्थ-विधानेनार्थवान् तादृशं चार्थं प्रमाणान्तरेणाप्राप्नं विधत्ते – यथा ‘अग्निहोत्रं जुहुया-त्स्वर्गकाम’ इति विधिर्मानान्तरेणाप्राप्नं स्वर्गप्रयोजनवद्धोमं विधत्ते, अग्निहोत्रहोमेन स्वर्गं भावयेदिति वाक्यार्थबोधः ।
इन (पञ्चविध विभागों में से अन्य प्रमाणों से) अज्ञात इष्ट का ज्ञान कराने वाला वेद का अंश विधि है। वह (विधि) उस प्रकार के प्रयोजनवान् अर्थ का विधान करने से सार्थक है जिस प्रकार का विषय (उस के अतिरिक्त) किसी दूसरे प्रमाण से उक्त नहीं होता । जैसे ‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः’ यह विधि दूसरे प्रमाण से अबोधित स्वर्गरूपी प्रयोजन से युक्त होम का विधान करता है। ‘अग्निहोत्र होम से स्वर्ग की भावना करे’ यह अर्थ (उक्त वाक्य का) समझना चाहिये ।
Q3. कः धर्मः ? [MPPSC AP SANSKRIT PRACHYA 2022]
अथ को धर्मः, किं तस्य लक्षणमिति चेत् । उच्यते – यागादिरेव धर्मः । तल्लक्षणं वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्म इति ।
Q4. द्वादशीलक्षणी का उच्यते ? [MPPSC AP 2022]
इह खलु परमकारुणिकेन मुनिना जैमिनिना धर्माधर्मविवेकाय द्वादशलक्षणी मीमांसा प्रणीता। – मीमांसार्थसंग्रहकौमुदी [अर्थसंग्रहभाष्य]
Q5. विधिः कतिविधः ? [MPPSC AP SANSKRIT PRACHYA 2022]
विधिश्चतुविधः – उत्पत्तिविधिः, विनियोगविधिः, अधिकारिविधिः, प्रयोगविधिश्चेति ।
Q6. ‘व्रीहीन् अवहन्ति’ इति वर्तते -[MPPSC AP SANSKRIT PRACHYA 2024]
पक्षे अप्राप्तस्य प्रापको विधिर्नियमविधिः
यथा – व्रीहीन् अवहन्ति
Q7. विनियोक्त्री श्रुतिः भवति – [MPPSC AP SANSKRIT PRACHYA 2022]
यस्य च शब्दस्य श्रवणादेव संबंधः प्रतीयते सा विनियोक्त्री।
(जिस शब्द के सुनने से ही सम्बन्ध प्रतीत होता है वह विनियोक्त्रीविधि है )
सा त्रिविधा –
क) विभक्तिरूपा
ख) एकाभिधानरूपा
ग) एकपदरूपा
Q8. ‘उद्भिदा यजेत पशुकाम’ इत्यस्मिन् वाक्ये विधिर्वर्तते – [UPPSC AP 2017]
( यह प्रकरण अर्थसंग्रह के विधि प्रकरण से संबंधित है) यदि ‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’ इस विधि द्वारा सोम रूप गुण का विधान मान लिया जाये तो ‘सोमेन यजेत‘ इस वाक्य में मत्वर्थलक्षणा स्वीकार करने का क्या प्रयोजन है? ऐसा प्रश्न उठने पर अर्थसंग्रहकार कहते हैं कि ‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’ यह अधिकार विधि है यह उत्पत्ति विधि नहीं हो सकती। इसलिए ‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’ इस विधि द्वारा सोम का विधान होना अपरिहार्य है। यहाँ पुनः शंका उत्पन्न की जा रही है कि जिस प्रकार ‘उद्भिदा यजेत पशुकामः’ यह उद्भिद नामक याग का बोधक है तथा अधिकार एवं उत्पत्ति दोनों विधियाँ हैं इसी प्रकार ‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’ इस वाक्य को भी अधिकार एवं उत्पत्ति विधि वाला क्यों न मान लिया जाये? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ‘ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत’ वाक्य में इन दोनों विधियों को मान लेने यज्ञ एवं यज्ञफलपरक दोनों विधान साथ साथ प्राप्त होने लगेगा जिससे वाक्यदोष होगा। इसलिए ‘सोमेन यजेत’ इस वाक्य में मत्वर्थलक्षणा को स्वीकार करके सोमविशिष्ट याग का विधान मान लेते हैं।
Q9. जिज्ञासा पद का विचार अर्थ होता है –
जिज्ञासापदस्य विचारे लक्षणा।
Q10. ‘अथातो धर्मजिज्ञासा’ में अथ का अर्थ है –
अत्राथ शब्दो वेदाध्ययनान्तर्य्यवचनः
Q11. अर्थसङ्ग्रह के मङ्गलाचरण में किस आचार्य के सिद्धान्त का अनुसरण करने की बात है –
वासुदेवं रमाकान्तं नत्वा लौगाक्षिभास्करः।
कुरुते जैमिनिनये प्रवेशायार्थसङ्ग्रहम्॥
Q12. महर्षि जैमिनी के अनुसार धर्म का लक्षण है –
Q13. ‘यजेत स्वर्गकामः’ में यजेत पद किस लकार में है –
विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्(अष्टा. 3.3.161)
Q14. अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागः कोऽस्ति ?
Q15. विधिः कतिविधो भवति?
- उत्पत्तिविधिः – तत्रकर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिरुत्पतिविधिः। (अग्निहोत्रं जुहोति)।
- विनियोग विधिः – अङ्गप्रधानसम्बन्धबोधको विधिः विनियोगविधिः (दध्ना जुहोति)।
- प्रयोगविधिः – प्रयोगप्राशुभावबोधको विधिः प्रयोगविधिः।
- अधिकारविधिः – कर्मजन्यफलस्वाम्यबोधको विधिरधिकारविधिः।
Q16. कर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिः कः?
– तत्रकर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिरुत्पतिविधिः। (अग्निहोत्रं जुहोति)
Q17. कर्मजन्यफलस्वाम्यकबोधकः विधिः कः ?
कर्मजन्यफलस्वाम्यबोधको विधिरधिकारविधिः।
Q18. विनियोगविधेः सहकारिप्रमाणानि कति भवन्ति?
विनियोगविधि के सहकारी 6 प्रमाण –
- श्रुति
- लिङ्ग
- वाक्य
- प्रकरण
- स्थान
- समाख्या
प्रयोगविधि के 6 प्रमाण –
- श्रुति
- अर्थ
- पाठ
- प्रवृति
- मुख्य
- स्थान
श्रुति के 3 भेद –
- विधात्री
- अधिधात्री
- विनियोक्त्री
Q19. द्वादशलक्षणी इति पदं कस्य विशेषणम्?
‘अथ परमकारुणिको भगवान् जैमिनिधर्मविवेकाय द्वादशलक्षणीं प्रणिनाय’।
Q20. “एकाङ्गानुवादेन विधीयमानयोः अङ्गयोः अन्तराले विहितत्वम्” भवति – [NET DEC 2023]
Q21. अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत – [NET DEC 2022]
कथनम् I. परिसंख्या त्रिदूषणा
कथनम् II.श्रुतहानात् अश्रुतकल्पनात् प्राप्तबाधनात्
यथोचितं विकल्पं चिनुत –
श्रुतार्थस्य परित्यागात् अश्रुतार्थस्य परिकल्पनात्।
प्राप्तस्य बाधात् इत्येवं परिसंख्या त्रिदूषणा॥
Q22. अर्थसंग्रहे कतिधा वेद उच्यते ? [JUNE 2020]
अथ को वेद इति चेदुच्यते? अपौरूषेयं वाक्यं वेदः।
स च विधिमन्त्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात् पञ्चविधः॥
Q23. कर्मकाण्डस्य प्रधानता कस्मिन् दर्शने प्रतिपाद्यते? [NET JUNE 2020]
Q24. श्लोकवार्तिकम् कस्य दर्शनस्य ग्रन्थोऽस्ति ? [NET JUNE 2020]
शबरभाष्य के प्रमुख व्याख्याकार कुमारिलभट्ट का प्रथम पाद पर लिखि गई टीका का नाम “श्लोकवार्तिक” है।
Q25. अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत –
कथनम् I. उत्पतिविधौ कर्मणः करणत्वेन अन्वयः।
कथनम् II. उत्पत्तिविधौ कर्मणः साध्यत्वेन अन्वयः।
यथोचितं विकल्पं चिनुत – [NET DEC 2022]
कथनम् I – उत्पत्तिविधि का उदाहरण अग्निहोत्रं जुहोति होता है इसमें सामान्यतः अग्निहोत्रं पद में द्वितीया विभक्ति है जो कर्म में सामान्यतः होती है परन्तु मीमांसक यहां कर्म के स्थान पर करण ( जो सामान्यतः तृतीयाविभक्ति में होता है) मानते है और कहते है (अन्वय)अग्निहोत्रहोमेन इष्टं भावयेत् अर्थात् अग्निहोत्र होम के द्वारा इष्ट की भावना करे। जो प्रथम कथन के लिए सत्य है।
कथनम् II – उसी बात को कहा जा रहा है कि उत्पत्ति विधि जो कर्ता का इष्ट, साध्य एवं परमलक्ष्य कर्मकारक के माध्यम से दर्शाया जाता है तो उत्पत्ति विधि में कर्म साध्य होता है जो असत्य है। अन्वय तो उपरोक्त प्रकार से ही सम्भव है।
Q26. न्यायरत्नमालायाः कर्ता कः? [RPSC P2 SEP 2024]
यह ग्रंथ मीमांसा दर्शन का सार है, जो कुमारिल भट्ट के ‘तंत्रवार्तिक’ पर आधारित है
Q27. शास्त्रदीपिकाग्रन्थस्य कर्ता अस्ति – [RPSC P2 SEP 2024]
इसमें मीमांसा-सम्मत विषयों का छह अधिकरणों के अंतर्गत विवेचन किया गया है
Q28. समुचितं मेलयत – [RPSC P2 SEP 2024]
List-I |
List-II |
A. कुमारिल भट्टः |
I. निबन्धनम् |
B. प्रभाकरमिश्रः |
II. टुप्टीका |
C. पार्थसारथिमिश्रः |
III. तर्ककौमुदी |
D. लौगाक्षिभास्करः |
IV. न्यायरत्नमाला |
समुचितम् उत्तरं चिनुत –
Q29. अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागोऽस्ति – [RPSC P1 OCT 2021]
अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधिः
स च तादृशप्रयोजनवत् अर्थविधानेन अर्थविधानेन अर्थवान् यादृशं चार्थं प्रमाणान्तरेण अप्राप्तं विधत्ते। यथा – ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकाम’ इति विधिः मानान्तरेण अप्राप्तं स्वर्गप्रयोजनवद् होमं विधत्ते, अग्निहोत्रहोमेन स्वर्गं भावयेदिति वाक्यार्थबोधः। (प्रधानविधिः)
यत्र कर्म मानान्तरेण प्राप्तं तत्र तदुदेशेन गुणमात्रं विधत्ते – दध्ना जुहोतीति इत्यत्र होमस्याग्निहोत्रं जुहुयात् इति अनेन प्राप्तत्वात् होमोद्देशेन दधिमात्रविधानां, दध्ना होमं भावयेदीति। (गुणविधिः)
यत्र तु उभयप्राप्तं तत्र विशिष्टं विधित्ते –
यथा – ‘सोमेन यजेत्’ इत्यत्र सोमयागयोः अप्राप्तत्वात् सोमविशिष्टयागविधानम्। सोमपदे मत्वर्थलक्षणया सोमवता यागेनेष्टं भावयेदिति वाक्यार्थबोधः। (गुणविशिष्टविधिः)
Q30. आर्थीभावनायाः साध्याकांक्षायां साध्यत्वेनान्वेति – [RPSC P1 OCT 2021]
आर्थीभावनायाः साध्याकांक्षायां स्वर्गादिफलम् साध्यत्वेन अन्वेति।
साधनाकांक्षायां यागादिः करणत्वेन अन्वेति।
इतिकर्तव्यताकाङ्क्षायां प्रयाजाद्यङ्गजातम् इतिकर्तव्यता अन्वेति।
आशा है कि आपको अर्थसंग्रह बहुविकल्पीय प्रश्न Arthsangrah MCQs उपयोगी और जानकारीपूर्ण लगा होगा। ऐसी ही उपयोगी जानकारी और मार्गदर्शन के लिए जुड़े रहें gopath.in & boks.in के साथ आपका सहयोग और विश्वास ही हमारी प्रेरणा है।
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