प्रिय विद्यार्थियों, इस पोस्ट में मेघदूत व्याख्या Meghdoot shlok-8 का ससंदर्भ तथा सप्रसंग व्याख्या है। इसके अंत में विशेष एवं व्याकरणात्मक टिप्पणी भी दिया गया है। यह देहली विश्वविद्यालय परास्नातक DU, M.A Sanskrit 2nd year का previous year प्रश्न पत्र का उत्तर है।
Q1. निम्नलिखित पद्यों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए –
Explain the following:
त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ताः
प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययावाश्वसत्यः।
कः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायां
न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः॥
अन्वय
पवनपदवीम् आरुढं त्वां पथिकवनिताः प्रत्ययात् आश्वसत्यः उद्गृहीताऽलकाऽन्ताः (सत्यः) प्रेक्षिष्यन्ते। त्वयि सन्नद्धे (सति) अहम् इव यो जनः पराऽधीनवृत्तिः न स्यात् (सः) कः अनयो विरहविधुरां जायाम् उपेक्षेत्।
सन्दर्भ
प्रस्तुत पद्य महाकविकालिदास विरचित ‘मेघदूतम्’ खण्डकाव्य/गीतिकाव्य के पूर्वमेघ से उद्धृत है।
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प्रसङ्ग
इस पद्य में यक्ष अपने सन्देश को अपनी प्रियतमा के पास अलकापुरी ले जाने के लिए मेघ को प्रेरित करते हुए कह रहे हैं कि तुम्हे देखकर वहाँ के पथिक वनिताएँ (स्त्रियाँ) प्रसन्न होंगी।
अन्वयार्थ
आकाशमार्ग से (पवनपदवीम्) विचरण करने वाले (आरूढम्) तुमको (त्वाम्) पथिकों की स्त्रियाँ (पथिकवनिताः) विश्वास से (प्रत्ययात्) आश्वस्त होती हुई (आश्वसत्यः) केशों के अग्र भाग को उठाकर (उद्गृहीतालकान्ताः) देखेंगी (प्रेक्षिष्यन्ते)। तुम्हारे (त्वयि) छा जाने पर (सन्नद्धे) मेरे समान (अहमिव) जो (यः) व्यक्ति (जनः) पराधीन व्यवहार वाला (पराधीनवृत्तिः) न हो (न स्यात्) ऐसा कौन दूसरा (कः अन्यः) (होगा जो), वियोग से व्यथित (विरह विधुरां) अपनी पत्नी की (जायां) उपेक्षा करेगा (उपेक्षेत)।
व्याख्या
पथिकों के आगमन से मेघ का घनिष्ठ सम्बन्ध है। मेघ को आकाश में आया हुआ देखकर यात्रा करने वाले अपने मूल स्थान की ओर शीघ्रता से गमन करते हैं। क्योंकि वर्षा काल में विरह से व्याकुल पत्नी की कोई उपेक्षा नहीं करता, केवल मेरे जैसा पराधीन व्यक्ति ही जाया (पत्नी) की उपेक्षा कर सकता है। पथिकों की बनिताएं अपने बिखरे हुए बालों को पकड़कर देखेंगी। इस कथन का तात्पर्य यह है कि तुमको देखकर उनकी आशा अत्यन्त सजीव हो उठेगी क्योंकि इस तरह एकटक देखना अत्यधिक आशा को प्रकट करता है। कोई भी स्वतन्त्र वृत्ति वाला व्यक्ति वर्षा काल में मेघ के आगमन पर अपनी विरह से व्याकुल जाया की उपेक्षा नहीं कर सकता, ऐसा यक्ष का विश्वास है। केवल मेरे समान पराधीन जीवन वाले मनुष्य ही वर्षा काल में अपनी जाया की प्रति गमन के लिए कोई उपक्रम नहीं करेंगे। ‘पवनपदवी’ का अर्थ प्रस्तुत पद्य में आकाश है। इससे कवि ने यह सूचित किया है कि आकाश में पवन ही मेघ को इधर उधर ले जाता है। अतः आकाश में जहां तक पवन का संचार है, वहीं तक मेघ का भी संचार है। इसलिए आकाश के अन्य पर्यायों को छोड़कर कवि ने पवनपदवी शब्द का प्रयोग किया है। इससे कवि ने यह भी सूचित किया है कि उसका अभिप्राय आकाश के उतने ही भाग से है- जहाँ पर पवन के वेग से मेघों का संचार होता रहता है। अतः आकाश के अनन्त हुए भी कवि तात्पर्य अनन्त आकाश से नहीं है।
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विशेष
- इस पद्य में मन्दाक्रान्ता छन्द है।
- मंदाक्रांता छन्द का लक्षण है – “मन्दाक्रान्ताऽम्बुधिरसनगैर्मो भनौ तौ गयुग्मम्”
- यह एक वर्णिक छंद है जिसमें प्रत्येक चरण (पाद) में 17 अक्षर होते हैं। जिसका क्रम मगण, भगण, नगण, दो तगण और दो गुरु होता है। इसमें चौथे, छठे और सातवें अक्षर पर यति होती है।
- इसमें गुण प्रसाद तथा रीति वैदर्भी है।
- पथिकवनिता का अर्थ होता है वैसी स्त्रियाँ जिसके परदेश गए हुए पति घर की ओर लौट रहे हैं। अतएव अभी मार्ग में हैं।
- मनुस्मृति के अनुसार पति गर्भरुप में पत्नि में उत्पन्न होता है इसलिए उसे जाया कहते हैं।
- यहाँ पथिकवनिताओं के ‘उद्गृहीतालकान्ताः’ इस स्वभाविक व्यापार से स्वाभावोक्ति अलङ्कार है।
- सामान्य से विशेष का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यास अलङ्कार भी है।
- कुतूहल नामक नायिकालङ्कार भी है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी
- पवनपदवीम् – पवनस्य पदवी (षष्ठी तत्पुरुष)
- उद्गृहीत् – उद्गृहीताः अलाकान्ताः याभिः वाः (बहुव्रीहि)
- पथिकवनिताः – पथिकानां वनिताः
- विरहविधुरां – विरहेण विधुरा (तृतीय तत्पुरुष)
- जायाम् – जायते अस्यामिति
- पराधीनवृत्तिः – पराधीना वृत्तिः यस्य सः (बहुव्रीहि)
- आरुढम् – आ + √रुह + क्त
- उद्गृहीत् – उत् + ग्रह + क्त
- प्रेक्षिष्यन्ते – प्र + ईक्ष् + लृट् (प्रथमपुरुष बहुवचन)
- सन्नद्धे – सम् + नह + क्त
- आश्वसत्यः – आश्वसन्ति इति आङ् + श्वस + शतृ + ङीप्
- उपेक्षेत – उप + ईक्ष् + विधिलिङ्ग (प्रथमपुरुष एकवचन)
- स्यात् – अस् धातु विधिलिङ्ग प्रथमपुरुष एकवचन
NOTE :- यह श्लोक व्याख्या केवल परीक्षा के लिए सहायक नहीं है अपितु श्लोक को सम्पूर्ण रुप से समझने के योग्य भी है। इस व्याख्या में व्याकरणात्मक टिप्पणी तथा विशेष की अधिकता है। अपने परीक्षा अंक के अनुसार इसका चयन किया जा सकता है।
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