मेघदूत व्याख्या Meghdoot shlok-1 (मङ्गलाचरण)

प्रिय विद्यार्थियों, इस पोस्ट में मेघदूत व्याख्या Meghdoot shlok-1 का ससंदर्भ तथा सप्रसंग व्याख्या है। इसके अंत में विशेष एवं व्याकरणात्मक टिप्पणी भी दिया गया है। यह देहली विश्वविद्यालय परास्नातक DU, M.A Sanskrit 2nd year का previous year प्रश्न पत्र का उत्तर है।

Q1. निम्नलिखित पद्यों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए –
Explain the following:

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमतः
शापेनास्तग्डःमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु॥1॥

अन्वय

स्वाधिकारात् प्रमत्तः कान्ताविरहगुरुणा वर्षभोग्येण भर्तुः शापेन अस्तङ्गमितमहिमा कश्चित् यक्षः जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु स्निग्धच्छायातरुषु रामगिर्याश्रमेषु वसतिं चक्रे ॥1॥

सन्दर्भ

प्रस्तुत श्लोक मेघदूत नामक गीतिकाव्य के पूर्वमेघ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि कालिदास हैं।

प्रसंग

मेघदूत नामक काव्य की कथा को प्रारम्भ करते हुए महाकवि कालिदास प्रस्तुत पद्य में अपने स्वामी कुबेर के द्वारा वर्ष पर्यन्त भोगे जाने वाले शाप से प्रभाव हीन हुए यक्ष के रामगिरि के आश्रमों में निवास का वर्णन करते हैं।

अन्वयार्थ

अपने अधिकार (कार्य) में (स्वाधिकारात्) प्रमादयुक्त (असावधान) (प्रमत्तः) प्रियतमा के वियोग के कारण दुःसह (कान्ताविरहगुरुणा) एक वर्ष तक भोगे जाने योग्य (वर्षभोग्येण) स्वामी (कुबेर) के (भर्तुः) शाप से (शापेन) जिसकी महिमा नष्ट कर दी गई है (अस्तङ्गमितमहिमा) (ऐसा) कोई (कश्चित्) यक्ष (यक्षः) जनक की पुत्री (सीता) के स्नानों से पवित्र जल वाले (जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु) घने छायादार (नमेरु) वृक्षों से युक्त  (स्निग्धच्छायातरुषु) रामगिरि के आश्रमों में (रामगिर्याश्रमेषु) निवास (वसतिं) किया (चक्रे) ॥1॥

व्याख्या

अपने काव्य के पालन में प्रसाद करने से स्वामी के द्वारा यक्ष को शाप दिया गया कि वह वर्ष भर अपनी प्रिया से दूर मर्त्य लोक में रहेगा। शाप से उस यक्ष का प्रभाव समाप्त हो गया है। अतः वह अन्तर्धान आदि विद्या का आश्रय लेकर अल्कापुरी में नहीं जा सकता। बिना इस शक्ति को समाप्त किए शाप का भोग सम्भव नहीं था। यह शाप यक्ष के लिए अधिक पीड़ादायक था, क्योंकि वह अपनी प्रिया से एक वर्ष तक वियुक्त रहेगा। उसने आश्रमों में निवास किया, इस बहुवचन प्रयोग का आशय यह है कि वह वर्ष पर्यन्त एक स्थान पर नहीं रहा। शाप की समाप्ति पुण्य स्थल में रहने से शीघ्र होती है। अतः रामगिरि के आश्रमों की पवित्रता निरूपित की गयी है। इन आश्रमों की पवित्रता का हेतु वे जल हैं जो सीता जैसी पतिव्रता के संयोग से पवित्र हैं। अतः पतिव्रता के संयोग से पवित्रता होती है। यह कवि ने सूचित किया है। यक्ष का नाम नहीं लिया गया है क्योंकि शापग्रस्त का नाम काव्य के आदि में लेना मांगलिक नहीं होता है। मल्लिनाथ ने मेघदूत के विषय में अपने समय में प्रचलित समीक्षकों की धारणा का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार कालिदास ने सीता के प्रति राम का सन्देश हनुमान के द्वारा कहे जाने को मन में रखकर मेघ के सन्देश की कल्पना की है। ‘स्न्धिछाया तरुष’ पद से कवि ने वृक्षों की घनी छाया वाले आश्रमों का कथन किया है, इससे यह सूचित होता है। कि ये आश्रम विरही के रुकने के लिए उपयुक्त हैं। जनकतनया के उल्लेख का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार यहां राम ने निवास किया था और वे सीता से संयुक्त थे और इसी स्थान पर निवास करते हुए राम को कभी सीता के वियोग का अनुभव नहीं हुआ। अतः इस पवित्र स्थान पर रहने से उसके शाप का प्रभाव शीघ्रता से क्षीण होगा और वह भी अपनी प्रिया को प्राप्त कर लेगा। इसी आशय से यक्ष ने इस स्थान का चुनाव किया। वर्षव्यापी शाप का आशय यह है कि एक वर्ष में सभी ऋतुएं होती है। अतः एक वर्ष का अनुभव मौलिक अनुभव कहा जाता है। इसके बाद उन्हीं अनुभवों की पुनरावृत्ति होती है। अतः इसके छः ऋतुओं में अनेक प्रकार के विरह दुःखों का अनुभव यक्ष ने किया, ऐसा द्योतित होता है।

विशेष

  • यहाँ कथावस्तु की ओर संकेत किया गया है, अतः वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण है।
  • इस श्लोक में मन्दाक्रान्ता छन्द है।
  • मंदाक्रांता छन्द का लक्षण है – “मन्दाक्रान्ताऽम्बुधिरसनगैर्मो भनौ तौ गयुग्मम्”
  • यह एक वर्णिक छंद है जिसमें प्रत्येक चरण (पाद) में 17 अक्षर होते हैं। जिसका क्रम मगण, भगण, नगण, दो तगण और दो गुरु होता है। इसमें चौथे, छठे और सातवें अक्षर पर यति होती है।
  • इसमें गुण प्रसाद तथा रीति वैदर्भी है।
  • कवि ने इस खण्डकाव्य में मेघ को दूत बनाया है, इसलिए इसे ‘मेघदूत’ कहते हैं।
  • मेघदूत को मल्लिनाथ ने ‘मेघसन्देश’ नाम से भी अभिहित किया है।
  • अलङ्कार – इस श्लोक में शाप के प्रति स्वाधिकारात्प्रमत्तः की कारणता होने के कारण काव्यलिङ्ग अलङ्कार है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी

  • कान्ताविरहगुरुणा – कान्तायाः विरहः (षष्ठी तत्पुरुष) = कान्ताविरहः, तेन गुरुणा (तृतीय तत्पुरुष)
  • अस्तङ्गमितमहिमा – अस्तं गमितः महिमा यस्य सः (बहुव्रीहि)
  • जनकतनया – जनकस्य तनया (षष्ठी तत्पुरुष)
  • स्निग्धच्छायातरुषु – स्निग्धाः छायातरवः येषु तेषु (बहुव्रीहि)
  • अधिकार – अधि+कृ+घञ्
  • प्रमत्तः – प्र+मद्+क्त
  • गमितः – मग्+णिच्+क्त
  • स्नानम् – स्ना+ल्युट्

NOTE :- यह श्लोक व्याख्या केवल परीक्षा के लिए सहायक नहीं है अपितु श्लोक को सम्पूर्ण रुप से समझने के योग्य भी है। इस व्याख्या में व्याकरणात्मक टिप्पणी तथा विशेष की अधिकता है। अपने परीक्षा अंक के अनुसार इसका चयन किया जा सकता है।

आशा है कि आपको मेघदूत व्याख्या Meghdoot shlok-1 उपयोगी और जानकारीपूर्ण लगा होगा। ऐसी ही उपयोगी जानकारी और मार्गदर्शन के लिए जुड़े रहें gopath.in & boks.in के साथ आपका सहयोग और विश्वास ही हमारी प्रेरणा है।

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