प्रिय विद्यार्थियों, इस पोस्ट में वेद , बृहद्देवता के बहुविकल्पीय प्रश्न Ved Brihaddevta ke MCQs है। जो मुख्यतः दिल्ली विश्वविद्यालय के परास्नातक संस्कृत के तृतीय सत्र 3rd Sem से संबंधित है तथा संस्कृत की विविध प्रतियोगी परिक्षाओं NET JRF, TGT PGT तथा विश्वविद्यालय स्तरीय परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।
Q1. आचार्यसायण के अनुसार पर्जन्यसूक्त में प्रणव का विशेषण है –
ति॒स्रो वाच॒: प्र व॑द॒ ज्योति॑रग्रा॒ या ए॒तद्दु॒ह्रे म॑धुदो॒घमूध॑: ।
स व॒त्सं कृ॒ण्वन्गर्भ॒मोष॑धीनां स॒द्यो जा॒तो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति ॥ (ऋ. ७.१०१.१)
ज्योतिर्द्योतमानः प्रणवः अग्रे प्रमुखो यासां तादृशी॥
Q2. पर्जन्यसूक्त का ऋषि है –
Q3. आचार्यसायण के अनुसार पर्जन्यसूक्त में ‘स्तरीः’ इस पद का अर्थ है –
स्त॒रीरु॑ त्व॒द्भव॑ति॒ सूत॑ उ त्वद्यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः ।
पि॒तुः पय॒: प्रति॑ गृभ्णाति मा॒ता तेन॑ पि॒ता व॑र्धते॒ तेन॑ पु॒त्रः ॥ ( ऋ. ७.१०१.३ )
अस्य पर्जन्यस्य त्वत् अन्यद्रूपं स्तरीः निवृत्तप्रसवाः गौः सा यथा न दोग्ध्री तद्ववत् वर्पुकं न भवति।
Q4. आचार्यसायण के अनुसार पर्जन्यसूक्त में पिता कौन हैं ?
स्त॒रीरु॑ त्व॒द्भव॑ति॒ सूत॑ उ त्वद्यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः ।
पि॒तुः पय॒: प्रति॑ गृभ्णाति मा॒ता तेन॑ पि॒ता व॑र्धते॒ तेन॑ पु॒त्रः ॥ ( ऋ. ७.१०१.३ )
अपि च पितुः दिवः सकाशात् पयः वृष्टचुदकं माता पृथिवी प्रति गृभ्णाति प्रतिगृह्णाति।
Q5. आचार्यसायण के अनुसार पर्जन्यसूक्त में ‘ विरप्शम् ‘ पद का अर्थ है –
यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि त॒स्थुस्ति॒स्रो द्याव॑स्त्रे॒धा स॒स्रुराप॑: ।
त्रय॒: कोशा॑स उप॒सेच॑नासो॒ मध्व॑: श्चोतन्त्य॒भितो॑ विर॒प्शम् ॥ ( ऋ. ७.१०१.४ )
विरप्शं महान्तं पर्जंन्यम् अभितः परितः मध्यः।
Q6. मण्डूकसूक्त का ऋषि है –
Q7. आचार्य सायण के अनुसार मण्डुकसूक्त में ‘अख्खलीकृत्य ‘ शब्द का अर्थ है –
यदी॑मेनाँ उश॒तो अ॒भ्यव॑र्षीत्तृ॒ष्याव॑तः प्रा॒वृष्याग॑तायाम् ।
अ॒ख्ख॒ली॒कृत्या॑ पि॒तरं॒ न पु॒त्रो अ॒न्यो अ॒न्यमुप॒ वद॑न्तमेति ॥ ( ऋ. ७.१०३.३ )
अख्खलकृत्य । अख्यल इति शब्दानुकरणम् ।
Q8. बृहद्देवता में स्तुतिपरकमन्त्र में किसकी गणना नहीं है ?
स्तुतिस्तु नाम्ना रूपेण कर्मणा बान्धवेन च।
स्वर्गायुर्धनपुत्राद्यैर् अर्थैराशीस्तु कथ्यते॥
Q9. बृहद्देवता का मङ्गलाचरण है –
मन्त्रदृग्भ्यो नमस्कृत्य समाम्नायानुपूर्वशः।
सूक्तर्धर्धर्चपादानाम् ऋग्भ्यो वक्ष्यामि दैवतम् ॥
Q10. बृहद्देवता का प्रमुखतः सम्बन्ध है –
मन्त्रदृग्भ्यो नमस्कृत्य समाम्नायानुतपूर्वश ।
सूक्तर्धर्धर्चपादानाम् ऋग्भ्यो वक्ष्यामि दैवतम् ॥
Q11. ‘ प्रथमो भजते तु आसम् ‘ इस पद्यांश में’ आसाम् ‘ पद है –
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् | |
| प्रथमा | इयं | इमे | इमाः |
| द्वितीया | इमां | इमे | इमाः |
| तृतीया | अनया | आभ्यां | आभिः |
| चतुर्थी | अस्यै | आभ्यां | आभ्यः |
| पञ्चमी | अस्याः | आभ्यां | आभ्यः |
| षष्ठी | अस्याः | अनयोः | आसाम् |
| सप्तमी | अस्यां |
अनयोः
|
आसु
|
Q12. बृहद्देवता के अनुसार अल्पतरा ऋचा है –
स्तुत्याशिषौ तु यास्वृक्षु दृश्येतेऽल्पास्तु ता इह।
ताभ्यश्चाल्पतरास्ताः स्युः स्वर्गो याभिस्तु याच्यते॥
Q13. सम्पूर्णमृषिवाक्यं तु ……….. इत्यभिधीयते –
Q14. बृहद्देवता के अनुसारं सूक्त का प्रकार है –
[ देवता – आर्ष – अर्थ – छन्दः तु वैविध्यं च प्रजायते]
Q15. ‘ गर्भमोषधीनाम् ‘ ऐसा विशेषण है –
तिस्त्रो वाचः प्र वद ज्योतिरग्रा या एत्ददुहे मधूदोघमूधा ।
स वत्सं कृण्वन्गर्भमोषधीनां सघो जातो वृषभो रोरवीति ॥
Q16. पर्जन्सूक्त में प्राप्त “मयः” इसका तात्पर्य है –
इ॒दं वच॑: प॒र्जन्या॑य स्व॒राजे॑ हृ॒दो अ॒स्त्वन्त॑रं॒ तज्जु॑जोषत् ।
म॒यो॒भुवो॑ वृ॒ष्टय॑: सन्त्व॒स्मे सु॑पिप्प॒ला ओष॑धीर्दे॒वगो॑पाः ॥ ( ऋ. ७.१०१.५ )
मयोभुवः सुखस्य भावयित्र्यः
मयः सुखनाम ( निघण्टु ३.६ )
Q17. “संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः।
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषु॥”
प्रस्तुतमन्त्रे छन्दोऽस्ति –
Q18. ‘ मायुः ‘ पद का अर्थ है –
गोमायुरेको भजमायुरेकः……
गोर्मायुरिव मायुः शब्दो यस्य तादृशो भवति।
Q19. निघण्टु में “पुरू” इसका वर्णन प्राप्त होता है –
उरू । तुवि । पुरू । भूरि……..इति द्वादश बहुनामानि
Q20. अध्वर्यु नामक याज्ञिक किस वेद का होता है –
Q21. आचार्यसायण के अनुसारं जुगुपुः इस पद की धातु क्या है ?
दे॒वहि॑तिं जुगुपुर्द्वाद॒शस्य॑ ऋ॒तुं नरो॒ न प्र मि॑नन्त्ये॒ते ।
सं॒व॒त्स॒रे प्रा॒वृष्याग॑तायां त॒प्ता घ॒र्मा अ॑श्नुवते विस॒र्गम् ॥ ( ऋ. ७.१०३.९)
जुगुपुः गोपायन्ति । काले काले रक्षन्ति । ( सायणभाष्ये )
Q22. आचार्यसायण के अनुसार ‘पृश्निः ‘ शब्द का अर्थ है –
गोमा॑यु॒रेको॑ अ॒जमा॑यु॒रेक॒: पृश्नि॒रेको॒ हरि॑त॒ एक॑ एषाम् ।
स॒मा॒नं नाम॒ बिभ्र॑तो॒ विरू॑पाः पुरु॒त्रा वाचं॑ पिपिशु॒र्वद॑न्तः ॥
एकः पृश्निः पृश्निवर्णः । ( सायणभाष्ये )
Q23. बृहद्देवता के आरम्भ में किसको नमस्कार किया गया है ?
मन्त्रदृग्भ्यो नमस्कृत्वा समाम्नायानुपूर्वशः ।
सूक्तार्घधर्चपादानाम् ऋग्भ्यो वक्ष्यामि दैवतम् ॥
Q24. प्रत्येक मन्त्र में प्रयत्नपूर्वक किसको जानने का प्रयास करना चाहिए।
वेदितव्यं दैवतं हि मन्त्रे मन्त्रे प्रयत्नतः ।
दैवतज्ञो हि मन्त्रणां तदर्थमवगच्छति ॥
Q25. बृहद्देवता के प्रथम श्लोक में आए समाम्नाय पद का अर्थ है –
ऋग्भ्यः समाम्नाय
विशेष्य विशेषण
Q26. कर्म कितने प्रकार के होते है –
वैदिक तथा लौकिक
Q27. बृहद्देवतानुसार मन्त्र कितने प्रकार के है?
स्तुतिपरक, आशीर्वादपरक
स्तुतिस्तु नाम्ना रूपेण कर्मणा बान्धवेन च।
स्वर्गायुर्धनपुत्राद्यैरर्थैराशीस्तु कथ्यते ॥
Q28. ऋषि के सम्पूर्ण वाक्य को कहते है –
सम्पूर्णम् ऋषिवाक्यं तु सूक्तमित्यभिधीयते ।
Q29. देवता, छन्द, अर्थ व ऋषि की दृष्टि से किसमें विविधता होती है?
वैविध्यमेवं सूक्तानाम् इह विद्याद्यथातथम्।
Q30. तत्वदर्शी ऋषियों द्वारा किसका कथन हो जाता है ?
स्तुवद्भिर्वा ब्रुवद्भिर्वा ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
भवत्युभयमेवोक्तम् उभयं ह्यर्थतः समम् ॥
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